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भारतीय ज्ञान परम्परा और चतुःषष्टि कला
नारायण, जयप्रकाश

भारतीय ज्ञान परम्परा और चतुःषष्टि कला

Science & Mathematics Published 2025 676.7 KB Verification Pending

Overview & Synopsis

भारतीय ज्ञान परंपरा में कलाओं का विशेष महत्त्व हैं । संस्कृत वाङ्मय में विविध पराकार की कलाओं का विवेचन प्राप्त होता हैं ,जिनमें चतुःषष्टि कला विशेष उल्लेखनीय हैं। कला शब्द संस्कृत की कल् धातु से कच् 'तथा टाप् (कल्+ कच्+ टाप्) प्रत्यय लगाने से बनता है। संस्कृत कोश में यह शब्द विभिन्न अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। जैसे किसी वस्तु का छोटा खण्ड, चन्द्रमा की एक रेखा, शोभा,अलङ्करण, कुशलता अथवा मेधाविता आदि ।परन्तु इतिहास तथा संस्कृति में कला से तात्पर्य सौन्दर्य से है। अपने मनोगत भावों को सौदर्य के साथ दृश्य रूप में व्यक्त करना ही कला है। आचार्य क्षेमराज के अनुसार- “अपने स्व को किसी न किसी वस्तु के माध्यम से व्यक्त करना ही कला है और यह अभिव्यक्ति चित्र, नृत्य,मूर्ति, वाद्य आदि के माध्यम से होती है।” इस प्रकार कला मनुष्य की सौंदर्य भावना को मूर्त रूप प्रदान करती है। प्राचीन भारत में कला को साहित्य और संगीत के समकक्ष मानते हुए मनुष्य के लिए उसे आवश्यक बताया गया है साहित्यसंगीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः । तृणं न खादन्नपि जीवमानस्तद्भागधेयं परमं पशूनाम् ॥[1]

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Document Information

Document Title भारतीय ज्ञान परम्परा और चतुःषष्टि कला
Author / Organization नारायण, जयप्रकाश
Subject & Discipline Scientific Research & Data
Categories Science & Mathematics
Publication Year 2025
License / Rights cc-by-4.0
Resource Verification Listed PDF (Verification Pending)
Original Host Website Zenodo (zenodo.org)
File Format application/pdf (Portable Document Format)
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Language EN
Catalog ID DOC-2482
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