भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वास्तिक का सुदूर विस्तार
Overview & Synopsis
स्वास्तिक न केवल एक ज्यामितीय आकृति है, बल्कि यह मानव इतिहास की अत्यंत प्राचीनतम सांस्कृतिक प्रतीकों में से एक है। इसकी उत्पत्ति संस्कृत के उपसर्ग ‘सु’ (कल्याण) और ‘अस्ति’ (होना) से हुई है। ‘सु-अस्ति’ का अर्थ है—‘सभी का कल्याण हो’ या ‘मंगल हो’। प्राचीन भारतीय सभ्यता में स्वास्तिक को शुभ और पवित्र चिन्ह माना गया है। यह वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक निरंतर रूप से पूजा, अनुष्ठान और दैनिक जीवन का हिस्सा रहा है। इस मांगलिक चिन्ह के पीछे गहरे दार्शनिक अर्थ निहित हैं, जो इसे केवल एक धार्मिक प्रतीक न बनाकर व्यापक जीवन दर्शन का प्रतिनिधि बनाते हैं।
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Document Information
| Document Title | भारतीय ज्ञान परंपरा में स्वास्तिक का सुदूर विस्तार |
|---|---|
| Author / Organization | Somvanshi, Susheel |
| Subject & Discipline | Scientific Research & Data |
| Categories | Science & Mathematics |
| Publication Year | 2026 |
| License / Rights | cc-by-4.0 |
| Resource Verification | Listed PDF (Verification Pending) |
| Original Host Website |
Zenodo
(zenodo.org)
|
| File Format | application/pdf (Portable Document Format) |
| Reported File Size | 1601.3 KB (1,639,749 bytes) |
| Language | EN |
| Catalog ID | DOC-128054 |
| Original Source Link | Visit Source Page on zenodo.org » |